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सेमीकंडक्टर निर्माण और चिप डिज़ाइन में भारत की नई दिशा

ANH समाचार ब्यूरो4 October 2026 at 12:00 am2 min read
सेमीकंडक्टर निर्माण और चिप डिज़ाइन में भारत की नई दिशा
सेमीकंडक्टर निर्माण और चिप डिज़ाइन में भारत की नई दिशाPhoto Credit: Ministry of Electronics and Information Technology (MeitY)

सेमीकंडक्टर फॅब्रीकेशन और EDA टूल्स के विकास से भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता तेज़ हो रही है। यह लेख उद्योग के वर्तमान परिदृश्य, प्रमुख आँकड़े और भविष्य की संभावनाओं को उजागर करता है।

भारत की तेज़ी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था को समर्थन देने के लिए सेमीकंडक्टर निर्माण और चिप डिज़ाइन बुनियादी ढाँचा अनिवार्य बन गया है। वैश्विक चिप की माँग में 2023 में 6% की वृद्धि हुई, जबकि भारत का वर्तमान वैश्विक बाजार हिस्सा केवल 0.5% है। इस अंतर को पाटने हेतु सरकार ने "सेमीकंडक्टर मिशन" के तहत कई पहलें शुरू की हैं, जिससे घरेलू फॅब्रीकेशन क्षमता और EDA (इलेक्ट्रॉनिक डिज़ाइन ऑटोमेशन) टूल्स का विकास तेज़ हो रहा है।

फॅब्रीकेशन प्लांट्स और निवेश

भारत में अब तक पाँच बड़े सिलिकॉन वैली फॅब्रीकेशन प्लांट्स (स्मार्ट फॅब) स्थापित हो चुके हैं, जिनमें कुल निवेश लगभग ₹1,20,000 करोड़ है। ये प्लांट्स 28 nm और 14 nm प्रोसेस तकनीक पर कार्य कर रहे हैं, जिससे मोबाइल प्रोसेसर, ऑटोमोटिव चिप्स और एआई एक्सेलेरेटर्स का उत्पादन संभव हो रहा है। निजी क्षेत्र की कंपनियों जैसे टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स, एचपीसीएल और अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के सहयोग से फॅब्रीकेशन क्षमता में निरंतर वृद्धि की उम्मीद है।

EDA टूल्स और चिप डिज़ाइन इकोसिस्टम

सेमीकंडक्टर डिजाइन के लिए आवश्यक EDA टूल्स का अधिकांश हिस्सा अभी भी विदेशी विक्रेताओं से आयात किया जाता है। हालाँकि, भारत में अब दो प्रमुख घरेलू EDA स्टार्टअप – "इंडियन डिज़ाइन सॉल्यूशन्स" और "स्मार्टवायर टेक्नोलॉजीज" – ने 2024 में मिलकर 5,000 करोड़ रुपये की फंडिंग प्राप्त की है। इन टूल्स की उपलब्धता से छोटे और मध्यम आकार के उद्यम (SMEs) को अपने चिप डिज़ाइन को स्वदेशी रूप से विकसित करने का अवसर मिल रहा है, जिससे आयात पर निर्भरता घटेगी।

उद्योग पर व्यापक प्रभाव

सेमीकंडक्टर उत्पादन और डिजाइन में आत्मनिर्भरता न केवल इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग को सशक्त बनाती है, बल्कि ऑटोमोबाइल, टेलीकोम, रक्षा और स्वास्थ्य‑सेवा जैसे क्षेत्रों में भी नवाचार को गति देती है। उदाहरण के तौर पर, भारतीय ऑटो निर्माताओं ने अब अपने इलेक्ट्रिक वाहन (EV) के लिए स्थानीय रूप से निर्मित पावर मैनेजमेंट चिप्स का उपयोग शुरू किया है, जिससे लागत में 12% की कमी आई है।

भविष्य की राह

आगामी पाँच वर्षों में भारत का लक्ष्य 2028 तक वैश्विक सेमीकंडक्टर बाजार में 3% हिस्सेदारी हासिल करना है। इसके लिए निरंतर निवेश, कौशल विकास और नियामक समर्थन आवश्यक होगा। सरकार की "इंडियन चिप्स एक्ट" की संभावित मंजूरी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकती है, जिससे IP सुरक्षा और फंडिंग में सुधार होगा।

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कहानी का संदर्भ और व्याख्या

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Tags:#सेमीकंडक्टर#चिप डिज़ाइन#India#उद्योग#तकनीक
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